
पडिसमयं सुज्झंतो अणंतगुणिदाए उभयसुद्धीए ।
पढमं सुक्कं ज्झायदि, आरूढो उभयसेणीसु ॥482॥
अन्वयार्थ : [उभयसेणीसु आरूढो] दोनों श्रेणियों में आरूढ होकर [पडिसमयं] समय-समय [अणंतगुणिदाए उभयसुद्धीए सुज्झंतो] अनन्तगुणी विशुद्धता कर्म के उपशम तथा क्षयरूप से शुद्ध होता हुआ मुनि [पढमं सुक्कं ज्झायदि] प्रथम शुक्ल-ध्यान ध्यान करता है ।
छाबडा