
णिस्सेसमोहविलए, खीणकसाए य अंतिमेकाले ।
ससरूवम्मि णिलीणो, सुक्कं ज्झाएदि एयत्तं ॥483॥
अन्वयार्थ : [णिस्सेसमोहविलए] समस्त मोह-कर्म के नाश होने पर [खीणकसाए य अंतिमेकाले] क्षीण-कषाय गुणस्थान के अन्त के काल में [ससरूवम्मिणिलीणो] अपने स्वरूप में लीन हुआ [एयत्तं सुक्कं ज्झाएदि] एकत्व-वितर्क-वीचार ध्यान करता है ।
छाबडा