+ तीसरा शुक्ल-ध्यान -
केवलणाणसहावो, सुहमे जोगम्हि संठिओकाए ।
जं ज्‍झायदि सजोगिजिणो, तं तिदियं सुहमकिरियं च ॥484॥
अन्वयार्थ : [केवलणाणसहावो] केवल ज्ञान ही है स्‍वभाव जिसका ऐसा [सजोगिजिणो] सयो‍गीजिन [सुहमंकाए जोगम्हि संठिओ] जब सूक्ष्‍म-काययोग में स्थित होकर उस समय [जं जझायदि] जो ध्‍यान करता है [तं तिदियं सुहमकिरियं च] वह तीसरा सूक्ष्‍म-क्रिया (शुक्‍ल-ध्‍यान) है ।

  छाबडा