
जोगविणासं किच्चा, कम्मचउक्कस्स खवणकरणट्ठं ।
जं ज्झायदि अजोगिजिणो, णिक्किरियं तं चउत्थं च ॥485॥
अन्वयार्थ : [जोगविणासं किच्चा] योगों का अभाव करके [अजोगिजिणो] अयोगी जिन [कम्मचउक्कस्स खवणकरणट्ठं] चार अघातिया कर्म का क्षय करने के लिये [जं ज्झायदि] जो ध्यान करते हैं [तं चउत्थं णिक्किरियं च] वह चौथा व्युपरतक्रियानिवृत्ति है ।
छाबडा