
एसो वारसभेओ, उग्गतवोजोचरेदि उवजुत्तो ।
सो चाविय कम्मपुंजं, मुत्तिसुहं उत्तमं लहदि ॥486॥
अन्वयार्थ : [एसो वारसभेओ] यह बारह प्रकार का [उग्गतवो जो उवजुत्तो चरेदि] उग्रतप को जो उपयोग सहित करता है [सो कम्मपुंजं खविय] सो कर्म-समूह का नाश करके [उत्तमं मुत्तिसुहं लहदि] उत्तम मोक्ष-सुख को पाता है ।
छाबडा