+ उपदेश का फल -
वारसअणुवेक्‍खाओ, भणिया हु जिणागमाणुसारेण ।
जो पढइ सुणइ भावइ, सो पावइ उत्‍तमं सोक्‍खं ॥488॥
अन्वयार्थ : [वारसअणुपेक्‍खाओ जिणागमाणुसारेण भणिया हु] ये बारह अनुप्रेक्षायें जिनागम के अनुसार कही हैं [जो पढइ सुणइ भावइ] जो इनको पढे़, सुने और इनकी भावना (बारम्‍बार चिन्‍तवन) करे [सो उत्‍तमं सोक्‍खं पावइ] सो उत्‍तम (बाधारहित, अविनाशी, स्‍वात्‍मीक) सुख को पावे।

  छाबडा