
रागद्वेषासंयममद्दु:खभयादिकं न यत्कुरुते ।
द्रव्यं तदेव देयं सुतप: स्वाध्याय वृद्धिकरम् ॥170॥
जो वस्तुएं मद राग द्वेष, रु दुख असंयम भयादि ।
को नहिं करें वे देय, करतीं सुतप स्वाध्याय वृद्धि हि ॥१७०॥
अन्वयार्थ : [यत्] जो [द्रव्यं] द्रव्य [रागद्वेषासंयममददु:खभयादिकं] राग, द्वेष, असंयम, मद, दु:ख, भय आदि [न कुरुते] नहीं करता हो और [सुतप: स्वाध्याय वृद्धिकरम्] उत्तम तप तथा स्वाध्याय की वृद्धि करनेवाला हो [तत् एव] वही [देयं] देने योग्य है ।
Meaning : Only such things should be given as help in the prosecution of studies, and the due observance of austerities, and which do not bring about fondness, disgust, incontinence, intoxication, pain, fear, etc.
टोडरमल