कृतमात्मार्थं मुनये ददाति भक्तमिति भावितस्त्याग: ।
अरतिविषादविमुक्त: शिथिलितलोभो भवत्यहिंसैव ॥174॥
अपने लिए कृत दे मुनि को, भोज्य प्रीति हर्ष युत ।
है लोभ शिथिलित दान यों, होता अहिंसामय सतत ॥१७४॥
अन्वयार्थ : [आत्मार्थं] अपने लिए [कृतम्] बनाया हुआ [भक्तम्] भोजन [मुनये] मुनि को [ददाति] देवे [इति] इस प्रकार [भावित:] भावपूर्वक [अरतिविषाद-विमुक्त:] अप्रेम और विषादरहित तथा [शिथिलितलोभ:] लोभ को शिथिल करनेवाला [त्याग:] दान [अहिंसा एव] अहिंसा स्वरूप ही [भवति] है ।
Meaning : When one gives to a saint food out of what he has prepared for himself, such thoughtfully offered gift, which is made without any disregard or regret, with suppressed greed, is itself Ahimsa.

  टोडरमल