
ऊर्ध्वमधस्तात्तिर्यग्व्यतिक्रमा: क्षेत्रवृद्धिराधानम् ।
स्मृत्यन्तरस्य गदिता: पंचेति प्रथमशीलस्य ॥188॥
हैं ऊर्ध्व तिर्यग् अध: व्यतिक्रम, क्षेत्र वृद्धि विस्मरण ।
हैं प्रथम दिग्व्रत शील के ये, पाँच दोष करो त्यजन ॥१८८॥
अन्वयार्थ : [ऊर्ध्वमधस्तात्तिर्यग्व्यतिक्रमा:] ऊपर, नीचे और समान भूमिकी की हुई मर्यादा का उल्लंघन करना अर्थात् जितना प्रमाण किया हो, उससे बाहर चला जाना [क्षेत्रवृद्धि:] परिमाण किये हुये क्षेत्र की लोभादिवश वृद्धि करना और [स्मृत्यन्तरस्य] स्मृति के अलावा क्षेत्र की मर्यादा [आधानम्] धारण करना अर्थात् मर्यादा को भूल जाना [इति] इस प्रकार [पञ्च] पाँच अतिचार [प्रथमशीलस्य] प्रथम शील अर्थात् दिग्व्रत के [गदिता:] कहे गए हैं ।
Meaning : Exceeding the limits above, below, and in di. rections, increasing boundaries, and forgetting the limits, are said to be 5 of the first Sheela .
टोडरमल