+ अनर्थदण्डत्यागव्रत के पाँच अतिचार -
कन्दर्प: कौत्कुच्यं भोगानर्थक्यमपि च मौखर्यम् ।
असमीक्षिताधिकरणं तृतीयशीलस्य पंचेति ॥190॥
कन्दर्प कुत्सित काय कृति, भोगोपभोगानर्थता ।
वाचालता निर्विचारता, ये अनर्थ विरति कि दोषता ॥१९०॥
अन्वयार्थ : [कन्दर्प:] काम के वचन बोलना, [कौत्कुच्यं] भांडरूप अयोग्य कायचेष्टा करना, [भोगानर्थक्यम्] भोग-उपभोग के पदार्थों का अनर्थक्य, [मौखर्यम्] वाचालता [च] और [असमीक्षिताधिकरणं] विचार किये बिना कार्य करना; [इति] इस प्रकार [तृतीयशीलस्य] तीसरे शील अर्थात् अनर्थदण्डविरति व्रत के [अपि] भी [पञ्च] पाँच अतिचार हैं ।
Meaning : Uttering obscene words, gesticulating with obscene words, misuse of articles of use, gossip, and acting unthinkingly (are) 5 (breaches) of the third Sheela (Anartha. Danda-Vrata).

  टोडरमल