
इत्येतानतिचारानपरानपि संप्रतर्क्य परिवर्ज्य ।
सम्यक्त्वव्रतशीलैरमलै: पुरुषार्थसिद्धिमेत्यचिरात् ॥196॥
यों इन अतिचारों अपर भी, सोच तज सम्यक्त्व व्रत ।
शीलादि निर्मल से पुरुष की, अर्थ सिद्धि शीघ्र नित ॥१९६॥
अन्वयार्थ : [इति] इस प्रकार गृहस्थ [एतान्] इन पूर्वोक्त [अतिचारान्] अतिचार और [अपरान्] दूसरे दोषोत्पादक अतिक्रम, व्यतिक्रम आदि का [अपि] भी [संप्रतर्क्य] विचार करके [परिवर्ज्य] छोड़कर [अमलै:] निर्मल [सम्यक्त्वव्रतशीलै:] सम्यक्त्व, व्रत और शील द्वारा [अचिरात्] अल्प काल में ही [पुरुषार्थसिद्धिम्] पुरुष के प्रयोजन की सिद्धि [एति] पाते हैं ।
Meaning : One with control, who has understood these transgressions, and has avoided them, soon attains the spiritual goal through faultless right faith, vows, and Sheelas.
टोडरमल