+ अतरङ्ग तप -
विनयो वैयावृत्त्यं प्रायश्चित्तं तथैव चोत्सर्ग: ।
स्वाध्यायोऽथ ध्यानं भवति निषेव्यं तपोऽन्तरङ्गमिति ॥199॥
नित प्रायश्चित्त विनय, वैयावृत व्युत्सर्ग अध्ययन ।
है ध्यान तप आभ्यन्तरी, नित सेव्य ये जिनवर कथन ॥१९९॥
अन्वयार्थ : [विनय:] विनय, [वैयावृत्त्यं] वैयावृत्त्य, [प्रायश्चित्तं] प्रायश्चित्त [तथैव च] और इसी प्रकार [उत्सर्ग:] उत्सर्ग, [स्वाध्याय:] स्वाध्याय [अथ] और [ध्यानं] ध्यान- [इति] इस तरह [अन्तरङ्गम्] अन्तरङ्ग [तप:] तप [निषेव्यं] सेवन करने योग्य [भवति] है ।
Meaning : Respect, service, expiation, renunciation, study and concentration are the internal austerities which should be observed.

  टोडरमल