+ मुनिव्रत की प्रेरणा -
जिनपुङ्गवप्रवचने मुनीश्वराणां यदुक्तमाचरणम् ।
सुनिरूप्य निजां पदवीं शक्तिं च निषेव्यमेतदपि ॥200॥
सब जिनागम में मुनिवरों का, कहा है जो आचरण ।
निज वीर्य पदवी सोचकर, उस रूप करना निज चरण ॥२००॥
अन्वयार्थ : [जिनपुङ्गवप्रवचने] जिनेश्वर के सिद्धान्त में [मुनीश्वराणाम्] मुनीश्वर अर्थात् सकलव्रतधारियों का [यत्] जो [आचरणम्] आचरण [उक्तम्] कहा है, [एतत्] यह [अपि] भी गृहस्थों को [निजां] अपने [पदवीं] पद [च] और [शक्तिं] शक्ति को [सुनिरूप्य] भले प्रकार विचार करके [निषेव्यम्] सेवन करना योग्य है ।
Meaning : Having due regard to one's own status and capacity, a (householder) should practise the conduct of saint, as described in the Scriptures.

  टोडरमल