
दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोध: ।
स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बन्ध: ॥216॥
है आत्म निश्चयमई दर्शन, आत्म परिज्ञान बोध है ।
आत्मा में स्थिरता सुचारित्र, बन्ध कैसे इन्हीं से? ॥२१६॥
अन्वयार्थ : [आत्मविनिश्चिति:] अपने आत्मा का विनिश्चय [दर्शनम्] सम्यग्दर्शन, [आत्मपरिज्ञानं] आत्मा का विशेष ज्ञान [बोध:] सम्यग्ज्ञान और [आत्मनि] आत्मा में [स्थिति:] स्थिरता [चारित्रं] सम्यक्चारित्र [इष्यते] कहा जाता है तो फिर [एतेभ्य: 'त्रिभ्य:'] इन तीनों से [कुत:] किस तरह [बन्ध:] बन्ध [भवति] होवे?
Meaning : Right belief is conviction in one's own Self. Knowledge is a knowledge of one's own Self; conduct is absorption in one's own Self. How can there be Bondage by these.
टोडरमल