+ रत्नत्रय से शुभ प्रकृतियों का भी बन्ध नहीं -
सम्यक्त्वचरित्राभ्यां तीर्थकराहारकर्म्मणो बन्ध: ।
योऽप्युपदिष्ट: समये न नयविदां सोऽपि दोषाय ॥217॥
सम्यक्त्व चारित्र से तीर्थंकर, कर्म आहारक बँधें ।
यह जो जिनागम वचन, हेतु दोष नहिं नयविज्ञ के ॥२१७॥
अन्वयार्थ : [अपि] और [तीर्थकराहारकर्म्मणा:] तीर्थंकर प्रकृति और आहारक द्विक प्रकृति का [य:] जो [बन्ध:] बन्ध [सम्यक्त्वचरित्राभ्यां] सम्यक्त्व और चारित्र से [समये] आगम में [उपदिष्ट:] कहा गया है, [स:] वह [अपि] भी [नयविदां] नय के ज्ञाताओं को [दोषाय] दोष का कारण [न] नहीं है ।
Meaning : Whatever bondage of Tirthankar Karma, or Ahi. raka Karma, has been described in the Scripture as due to Right Belief and Conduct, would not appear to be a mistake to those who are learned in the points of view.

  टोडरमल