
सति सम्यक्त्वचरित्रे तीर्थकराहारबन्धकौ भवत: ।
योगकषायौ नासति तत्पुनरस्मिन्नुदासीनम् ॥218॥
सम्यक्त्व चारित्रवान के ही, बँधें योग कषाय से ।
ही तीर्थकर आहारद्विक, नहिं हों बँधे नहिं राध से ॥२१८॥
अन्वयार्थ : [यस्मिन्] जिसमें [सम्यक्त्वचरित्रेसति] सम्यक्त्व और चारित्रवान को ही [तीर्थकराहारबन्धकौ] तीर्थंकर और आहारकद्विक के बन्धक [भवत:] होते हैं [योगकषायौ] योग और कषाय [असति न] नहीं होने पर [तत्] वह [पुन:] फिर [अस्मिन्] इस में [उदासीनम्] उदासीन हैं ।
Meaning : In presence of Right Belief and Conduct, only vibratory activity and passions cause the bondage of Tirthankara and Aharaka Karmas. Therefore they are quite unconcerned in this matter.
टोडरमल