
ननु कथमेवं सिद्ध्यति देवायु: प्रभृतिसत्प्रकृतिबन्ध: ।
सकलजनसुप्रसिद्धो रत्नत्रयधारिणां मुनिवराणाम् ॥219॥
नित रत्नत्रययुत मुनिवरों के, बँधें जग प्रसिद्ध यह ।
देवायु आदि सत् प्रकृतिआँ, सिद्ध कैसे? प्रश्न यह ॥२१९॥
अन्वयार्थ : [ननु] शंका-कोई पुरुष शंका करता है कि [रत्नत्रयधारिणां] रत्नत्रय के धारक [मुनिवराणां] श्रेष्ठ मुनियों को [सकलजनसुप्रसिद्ध:] सर्व लोक में भले प्रकार प्रसिद्ध [देवायु: प्रभृतिसत्प्रकृतिबन्ध:] देवायु आदि उत्तम प्रकृतियों का बन्ध [एवं कथम्] पूर्वोक्त प्रकार से किस तरह [सिद्ध्यति] सिद्ध होगा ।
Meaning : How then is there the bondage of good Karmas like celestial age, etc., to saints following Ratna Traya, well known to all persons, possible.
टोडरमल