
रत्नत्रयमिह हेतुर्निर्वाणस्यैव भवति नान्यस्य ।
आस्रवति यत्तु पुण्यं शुभोपयोगोऽयमपराध: ॥220॥
है मोक्ष का ही हेतु रत्नत्रय, नहीं है अन्य का ।
अपराध शुभ उपयोग मय, आस्रव हुआ यह पुण्य का ॥२२०
अन्वयार्थ : [इह] इस लोक में [रत्नत्रयं] रत्नत्रयरूप धर्म [निर्वाणस्य एव हेतु भवति] निर्वाण का ही कारण होता है, [अन्यस्य न] अन्य का नहीं, [तु यत्] परन्तु जो [पुण्यं आस्रवति] पुण्य का आस्रव होता है, [अयम् अपराध: शुभोपयोग:] यह अपराध शुभोपयोग का है ।
Meaning : . Ratna Traya is the cause of Nirvana only, and of nothing else. The good Karmas which inflow, are due to the Aparadha, Defect of Shubhopayoga, good thought activity.
टोडरमल