एकस्मिन् समवायादत्यन्तविरुद्धकार्ययोरपि हि ।
इह दहति घृतमिति यथा व्यवहारस्तादृशोऽपि रूढिमिति ॥221॥
नित एक में समवाय से, विपरीत अति ही परस्पर ।
के कार्य में व्यवहार रूढ़ि, ज्यों जलाता घी कथन ॥२२१॥
अन्वयार्थ : [हि एकस्मिन्] निश्चय से एक वस्तु में [अत्यन्तविरुद्धकार्ययो: अपि] अत्यन्त विरोधी दो कार्यों के भी [समवायात्] मेल से [तादृश: अपि] वैसा ही [व्यवहार: रूढिम्] व्यवहार रूढ़ि को [इत:] प्राप्त है, [यथा] जैसे [इह] इस लोक में [घृतम् दहति] 'घी जलाता है' - [इति] इस प्रकार की कहावत है ।
Meaning : In one (thought activity), distinctly contradictory effects may exist simultaneously. Ordinarily it is said that "Ghee burns" (although it is the heat transmitted in the ghee which burns and not the ghee itself). Similarly, it is so here, from the practical point of view.

  टोडरमल