
नत्यमपि निरुपलेप: स्वरूपसमवस्थितो निरुपघात: ।
गगनमिव परमपुरुष: परमपदे स्फुरति विशदतम: ॥223॥
हैं नित्य ही उपलेप बिन, उपघात बिन निज रूप में ।
स्थित विशद परमात्मा, नभसम प्रकाशित मोक्ष में ॥२२३॥
अन्वयार्थ : [नित्यमपि] हमेशा [निरुपलेप:] कर्मरूपी रज के लेप से रहित [स्वरूपसमवस्थित:] अपने अनन्तदर्शन-ज्ञान स्वरूप में भले प्रकार स्थित [निरुपघात:] उपघात रहित और [विशदतम:] अत्यन्त निर्मल [परमपुरुष:] परमात्मा [गगनम् इव] आकाश की भाँति [परमपदे] लोकशिखरस्थित मोक्षस्थान में [स्फुरति] प्रकाशमान होता है ।
Meaning : Ever free from contact, free from obstruction, fully absorbed in one's own self, the Highest supremely pure Soul is effulgent, like the sky, in the Highest Stage.
टोडरमल