+ नय-विवक्षा -
एकेनाकर्षन्ती श्लथयन्ती वस्तुतत्त्वमितरेणत्र ।
अन्तेन जयति जैनी नीतिर्मन्थाननेत्रमिव गोपी ॥225॥
ज्यों एक खीचें अन्य छोर, शिथिल करें मथते दही ।
त्यों विविध धर्मी वस्तु में से प्रयोजन वश एक ही॥
करते प्रमुख हैं अन्य गाैण, इसी तरह सब धर्म का ।
हो ज्ञान जैनी नीति यह, जयवन्त वर्ते नित यहाँ ॥२२५॥
अन्वयार्थ : [मन्थाननेत्रम्] दही की मथनी की रस्सी को खेंचनेवाली [गोपी इव] ग्वालिनी की तरह [जैनी नीति:] जिनेन्द्रदेव की स्याद्वाद नीति अथवा निश्चय-व्यवहाररूप नीति [वस्तुतत्त्वम्] वस्तु के स्वरूप को [एकेन] एक सम्यग्दर्शन से [आकर्षन्ती] अपनी तरफ खेंचती है, [इतरेण] दूसरे से अर्थात् सम्यग्ज्ञान से [श्लथयन्ती] शिथिल करती है और [अन्तेन] अन्तिम अर्थात् सम्यक्चारित्र से सिद्धरूप कार्य को उत्पन्न करने से [जयति] सर्व के ऊपर वर्तती है ।
Meaning : Like a milk maid, drawing one (end) of the rope and loosening the other, Jaina Philosophy deals with the reality of things and succeeds in (acquiring) the Essence.

  टोडरमल