+ विराधना -
जो रयणत्तयमइओ मुत्तूणं अप्पणो विसुद्धप्पा ।
चिंतेइ य परदव्वं विराहओ णिच्छयं भणिओ ॥20॥
यो रत्नत्रयमयं मुक्त्वात्मनो विशुद्धात्मानम् ।
चिंतयति च परद्रव्यं विराधको निश्चितं भणितः ॥२०॥
रत्नत्रयमय जीव की, करके जो बहु हानि ।
धरे ध्यान पर-द्रव्य का, उसे विराधक जान ॥२०॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [रयणत्तयमइओ] रत्नत्रय स्वरूप [अप्पणो] अपने [विसुद्धप्पा] विशुद्ध आत्मा को [मुत्तूणं] छोड़कर [परदव्वं] पर-द्रव्य की [चिंतेइय] चिन्ता करता है, वह [णिच्छयं] निश्चय से [विराहओ] विराधक [भणिओ] कहा गया है ।