
जो णवि बुज्झइ अप्पा णेय परं णिच्छयं समासिज्ज ।
तस्स ण बोही भणिया सुसमाही राहणा णेय ॥21॥
यः नैव बुध्यते आत्मानं नैव परं निश्चयं समासृत्य ।
तस्य न बोधिः भणिता सुसमाधिराराधना नैव ॥२१॥
जो निज को जाने नहीं, ना जाने पर तत्त्व ।
उसे नहीं आराधना, तथा न बोधि पवित्र ॥२१॥
अन्वयार्थ : [जो] जो पुरुष [णिच्छयं समासिज्ज] निश्चय नय का आलम्बन कर [अप्पा] आत्मा को [णवि बुज्झइ] नहीं जानता है और [परं] पर को [णवि बुज्झइ] नहीं जानता है [तस्स] उसके [ण बोही भणिया] न बोधि कही गई है, [ण सुसमाही भणिया] न सुसमाधि कही गई है और [णेय आराहणा भणिया] न आराधना ही कही गई है ।