
अरिहो संगच्चाओ कसाय2सल्लेहणा य कायव्वा ।
परिसहचमूण विजओ उवसग्गाणं तहा सहणं ॥22॥
इंदियमल्लाण जओ मणगयपसरस्स तह य संजमणं ।
काऊण हणउ खवओ चिरभवबद्धाइ कम्माइं ॥23॥
अर्हः संगत्यागं कषायसल्लेखनां च कर्तव्यां ।
परिषहचमूनां विजयमुपसर्गाणां तथा सहनम् ॥२२॥
इन्द्रियमल्लानां जयं मनोगतप्रसरस्य तथा च संयमनम् ।
कृत्वा हंतु क्षपकः चिरभवबद्धानि कर्माणि ॥२३॥
परिग्रह-त्याग, कषाय-कृश, परिषह-जय है कार्य ।
सहे तथा उपसर्ग सब, आराधक मुनि आर्य ॥२२॥
जीतते इन्द्रिय-मल्ल सब, रोके चित्त प्रसार ।
ऐसा मुनि चिरबद्ध निज, टाले कर्म प्रचार ॥२३॥
अन्वयार्थ : [खवओ] क्षपक [अरिहो] संन्यास धारण करने के योग्य होता हुआ [संगच्चाओ] संगत्याग [कायव्वा कसायसल्लेहणा] करने योग्य कषाय सल्लेखना, [परिसहचमूण विजओ] परिषह रूपी सेना का विजय [तहा उवसग्गाणं सहणं] तथा उपसर्गों का सहन, [इंदियमल्लाण जओ] इन्द्रिय रूपी मल्लों को जीतना [तहय] और [मणगयपसरस्स संजमणं] मन रूपी हाथी के प्रसार का नियन्त्रण [काऊण] करके
[चिरभवबद्धाइ] चिरकाल से अनेक भवों में बँधे हुए [कम्माइं] कर्मों को [हणउ] नष्ट करे ।