+ अर्ह का लक्षण -
छंडियगिहवावारो विमुक्कपुत्ताइसयणसंबंधो ।
जीवियधणासमुक्को अरिहो सो होइ सण्णासे ॥24॥
त्यक्तगृहव्यापारः विमुक्तपुत्रादिस्वजनसंबंधः ।
जीवितधनाशामुक्तः अर्हः स भवति सन्न्यासे ॥२४॥
हो विमुक्त सुत, स्वजन से, तजता जो गृह-पाश ।
जीवन, धन, आशा रहित, योग्य उसे संन्यास ॥२४॥
अन्वयार्थ : [छंडियगिहवावारो] जिसने गृह-सम्बन्धी व्यापार छोड़ दिये हैं, [विमुक्कपुत्ताइसयणसंबंधो] जिसने पुत्र आदि आत्मीय जनों से सम्बन्ध छोड़ दिया है और [जीवियधणासमुक्को] जो जीवित तथा धन की आशा से मुक्त है [सो] वह [सण्णासे] संन्यास के विषय में [अरिहो] अर्ह (योग्य) [होइ] होता है ।