+ अर्ह के योग्य कब? -
जरवग्धिणी ण चंपइ जाम ण वियलाइ हुंति अक्खाइं ।
बुद्धीजाम ण णासइ आउजलं जाम ण परिगलई ॥25॥
आहारासणणिद्दाविजओ जावत्थि अप्पणो णूणं ।
अप्पाणमप्पणोण य तरइ य णिज्जावओ जाम ॥26॥
जाम ण सिढिलायंति य अंगोवंगाइ संधिबंधाइं ।
जाम ण देहो कंपइ मिच्चुस्स भयेण भीउव्व ॥27॥
जा उज्जमो ण वियलइ संजमतवणाणझाणजोएसु ।
तावरिहो सो पुरिसो उत्तमठाणस्स संभवई ॥28॥
जराव्याघ्री न चंपते यावन्न विकलानि भवंति अक्षाणि ।
बुद्धिर्यावन्न नश्यति आयुर्जलं यावन्न परिगलति ॥२५॥
आहारासननिद्राविजयो यावदस्ति आत्मनो नूनम् ।
आत्मानमात्मना न च तरति च निर्यापको यावत् ॥२६॥
यावत् न शिथिलायंते अंगोपांगानि संधिबंधाश्च ।
यावन्न देहः कंपते मृत्योर्भयेन भीत इव ॥२७॥
यावदुद्यमो न विगलति संयमतपोज्ञानध्यानयोगेषु ।
तावदर्हः स पुरुषः उत्तमस्थानस्य संभवति ॥२८॥
जरा-व्याधि आई नहीं, जब तक करण सशक्त ।
जब तक बुद्धि न नष्ट हो, जब तक आयु प्रशस्त ॥२५॥
भोजन, आसन, नींद पर, जब तक निज अधिकार ।
निर्यापक बन आप ही, तिर सकता संसार ॥२६॥
शिथिल न अंगोपांग है, शिथिल न संधि बन्ध ।
मृत्यु-भीत जिनके सदृश, हो न देह में कम्प ॥२७॥
ज्ञान, ध्यान, तप योग में, शिथिल नहीं उद्योग ।
तब तक करना उचित है, शुभाराधना योग्य ॥२८॥
अन्वयार्थ : [जाम] जब तक [जरवग्घिणी] वृद्धावस्था रूपी व्याघ्री [ण चंपइ] आक्रमण नहीं करती, [अक्खाइं] इन्द्रियाँ [वियलाइं] विकल [ण हुंति] नहीं हो जातीं, [जाम बुद्धी ण णासइ] जब तक बुद्धि नष्ट नहीं होती [जाम आउजलं ण परिगलई] जब तक आयु रूपी जल नहीं गलता, [णूणं] निश्चय से [अप्पणो आहारासण णिद्दा णिजओ जावत्थि] जब तक अपने आपके आहार, आसन और निद्रा पर विजय है, [जाम] जब तक [णिज्जावओ अप्पाणमप्पणोण य तरइ य] अपना आत्मा स्वयं निर्यापकाचार्य बनकर अपने आपको नहीं तारता है, [जाम अंगोवंगाइ संधि बंधाइं य ण सिढिलायंति] जब तक अंगोपांग और सन्धियों के बन्धन ढीले नहीं पड़ जाते, [जाम] जब तक [देहो] शरीर [मिच्चुस्स] मृत्यु [भयेण] भय से [भीउव्व] डरे हुए के समान [ण कंपइ] नहीं काँपने लगता है तथा [संजम तवणाणझाणजोएसु] संयम, तप, ज्ञान, ध्यान और योग में [जा उज्जमो ण वियलइ] जब तक उद्यम नष्ट नहीं होता [ताव] तब तक [सो] वह [पुरिसो] पुरुष [उत्तमठाणस्स] उत्तम स्थान संन्यास के [अरिहो] योग्य [संभवई] होता है ।