
जाम ण हणइ कसाए स कसाई णेव संजमी होइ ।
संजमरहियस्स गुणा ण हुंति सव्वे विसुद्धियरा ॥37॥
यावन्न हंति कषायान् स कषायी नैव संयमी भवति ।
संयमरहितस्य गुणा न भवंति सर्वे विशुद्धिकराः ॥३७॥
हो न कषायी संयमी, इससे हनो कषाय ।
संयम बिन गुण अन्य भी, हों न शुद्ध सुखदाय ॥३७॥
अन्वयार्थ : [कसाई] कषाय से सहित [स] वह क्षपक [जाम] जब तक [कसाए ण हणइ] कषायों को नष्ट नहीं करता है [ताव] तब तक वह [संजमी] संयमी [णेव होइ] नहीं होता है और [संजमरहियस्स] संयम से रहित क्षपक के [सव्वे गुणा] समस्त गुण [विशुद्धियरा] विशुद्धि को करने वाले [ण हुंति] नहीं होते ।