+ क्षय रहित ही ध्यान योग्य -
तम्हा णाणीहिं सया किसियरणं हवइ तेसु कायव्वं ।
किसिएसु कसाएसु अ सवणो झाणे थिरो हवइ ॥38॥
तस्माद् ज्ञानिभिः सदा कृषीकरणं भवति तेषु कर्तव्यम् ।
कृशितेषु कषायेषु च श्रमणो ध्याने स्थिरो भवति ॥३८॥
इससे ज्ञानी सर्वदा, करें कषायें क्षीण ।
होते मन्द कषाय जब, हो मुनि निज में लीन ॥३८॥
अन्वयार्थ : [तम्हा] इसलिए [णाणीहिं] ज्ञानी जीवों के द्वारा [तेसु] उन कषायों के विषय में [सया] सदा [किसियरणं] कृशीकरण (क्षीणीकरण) [कायव्वं] करने योग्य [हवइ] है, क्योंकि [कसाएसु य] कषायों के [किसिएसु] कृश किये जाने पर [सवणो] मुनि [झाणे] ध्यान में [थिरो] स्थिर [हवइ] होता है ।