
सल्लेहिया कसाया करंति मुणिणो ण चित्तसंखोहं ।
चित्तक्खोहेण विणा पडिवज्जदि उत्तमं धम्मं ॥39॥
सल्लेखिता कषायाः कुर्वंति मुनेर्न चित्तसंक्षोभम् ।
चित्तक्षोभेन विना प्रतिपद्यते उत्तमं धर्मम् ॥३९॥
मन्द-कषायी साधु का, क्षुब्ध न होता चित्त ।
नष्ट क्षोभ उस जीव के, प्रकटे धर्म पवित्र ॥३९॥
अन्वयार्थ : [सल्लेहिया] छोड़ी हुई [कसाया] कषायें [मुणिणो] मुनि के [चित्तसंखोहं] चित्त में क्षोभ [ण करंति] नहीं करती हैं और [चित्तक्खोहेण विणा] चित्त क्षोभ में नहीं होने से मुनि [उत्तमं धम्मं] उत्तम धर्म को [पडिवज्जदि] प्राप्त होता है ।