
परिसहसुहडेहिं जिया केई सण्णासओहवे भग्गा ।
सरणं पइसंति पुणो सरीरपडियारसुक्खस्स ॥41॥
परीषहसुभटैर्जिता केचित् संन्यासाहवाद्भग्नाः ।
शरणं प्रविशंति पुनः शरीरप्रतीकारसुखस्य ॥४१॥
विकट परीषह से विजित, तज बैठे संन्यास ।
फिर निज, देह सुखार्थ ही, करे सदन में वास ॥४१॥
अन्वयार्थ : [सण्णासओहवे] संन्यास रूपी युद्ध में [परीसहसुहडेहिं] परीषह रूपी सुभटों के द्वारा [जिया] पराजित [केई] कितने ही लोग [भग्गा] भागकर [पुणो] फिर से [सरीरपडियारसुक्खस्स] शरीर के प्रतीकार - भोजन-वस्त्रादि विषय सुख की [सरणं] शरण में [पइसंति] प्रवेश करते हैं ।