
दुक्खाइं अणेयाइं सहियाई परवसेण संसारे ।
इण्हं सवसो विसहसु अप्पसहावे मणो किच्चा ॥42॥
दुःखान्यनेकानि सोढानि परवशेन संसारे ।
इदानीं स्ववशो विषहस्व आत्मस्वभावे मनः कृत्वा ॥४२॥
परवश इस संसार में, भोगे कष्ट अपार ।
स्ववश सही तु इस समय, निज में मन को धार ॥४२॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन् ! तूने [परवसेण] पराधीन हो [संसारे] संसार में [अणेयाइं] अनेक [दुक्खाइं] दुःख [सहियाई] सहन किये [इण्हं] अब [अप्पसहावे] आत्म-स्वभाव में [मणो किच्चा] मन लगाकर [सवसो] स्वाधीनता पूर्वक [विसहसु] सहन कर ।