
अइतिव्ववेयणाए अक्कंतो कुणसि भावणा सुसमा ।
जइ तो णिहणसि कम्मं असुहं सव्वं खणद्धेण ॥43॥
अतितीव्रवेदनाया आक्रांतः करोषि भावनां सुसमां ।
यदि तदा निहंसि कर्म अशुभं सर्वं क्षणार्धेन ॥४३॥
कीजे उपशम भावना, देख परीषह कष्ट ।
होगा क्षणभर में सभी, अशुभोदय तब नष्ट ॥४३॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन् ! [अइतिव्ववेयणाए] अत्यन्त तीव्र वेदना से [अक्कंतो] आक्रान्त हुआ तू [जइ] यदि [सुसमा भावणा] मध्यस्थ भावना [कुणसि] करता है [तो] तो तू [खणद्धेण] आधे क्षण में [सव्वं] समस्त [असुहं] अशुभ [कम्मं] कर्म को [णिहणसि] नष्ट कर सकता है ।