
परिसहभडाण भीया पुरिसा छंडंति चरणरणभूी ।
भुवि उवहासं पविया दुक्खाणं हुंति ते णिलया ॥44॥
परीषहभटेभ्यो भीताः पुरुषास्त्यजंति चरणरणभूमिम् ।
भुवि उपहासं प्राप्ता दुःखानां भवंति ते निलयाः ॥४४॥
दुख-सुभटों से भीत हो, जो तजते संन्यास ।
होता दुख का धाम वह, हो जग में उपहास ॥४४॥
अन्वयार्थ : [परिसहभडाण] परीषह रूपी सुभटों से [भीया] डरे हुए जो [पुरिसा] पुरुष [चरणरणभूी] चारित्र रूपी रणभूमि को [छंडंति] छोड़ देते हैं [ते] वे [भुवि] इस लोक में [उवहासं पविया] उपहास को प्राप्त होते हैं और परलोक में [दुक्खाणं णिलया] दुःखों के स्थान [हुंति] होते हैं ।