+ तीन गुप्ति द्वारा मन पर नियंत्रण -
परिसहपरचक्कभिओ जइ तो पइसेहि गुत्तितयगुत्तिं ।
ठाणं कुण सुसहावे मोक्खगयं कुणसु मणवाणं ॥45॥
परीषहपरचक्रभीतो यदि तदा प्रविश गुप्तित्रयगुप्तिम् ।
स्थानं कुरुष्व स्वस्वभावे मोक्षगतं कुरुष्व मनोवाणम् ॥४५॥
देख परीषह सैन्य को, कर तू गुप्ति प्रवेश ।
निज स्वभाव में स्थान कर, मन-सर मुक्ति निवेश ॥४५॥
अन्वयार्थ : हे क्षपक ! [जइ] यदि तू [परिसहपरचक्कभिओ] परीषह रूपी परचक्र - शत्रु सेना से भीत है [तो] तो [गुत्तितयगुत्तिं] तीन गुप्ति रूपी दुर्ग में [पइसेहि] प्रवेश कर [ससहावे] अपने स्वभाव में [ठाणं कुण] स्थान कर और [मणवाणं] मन रूपी बाण को [मोक्खगयं] मोक्षगत [कुणसु] कर ।