
परिसहदवग्गितत्तो पइसइ जइ णाणसरवरे जीवो ।
ससहावजलपसित्तो णिव्वाणं लहइ अवियप्पो ॥46॥
परीषहदवाग्नितप्तः प्रविशति यदि ज्ञानसरोवरे जीवः ।
स्वस्वभावजलप्रसिक्तो निर्वाणं लभते अविकल्पः ॥४६॥
ज्ञान-सरोवर मग्न यदि, टले परीषह ताप ।
स्व-स्वभाव-जल सिक्त चित, पाता शिव, हर पाप ॥४६॥
अन्वयार्थ : [परिसहदवग्गितत्तो] परीषह रूपी अग्नि से संतप्त [जीवो] जीव [जइ] यदि [णाणसरवरे] ज्ञान रूपी सरोवर में [पइसइ] प्रवेश करता है तो [ससहावजलपसित्तो] स्वभाव रूपी जल से सींचा जाकर [अवियप्पो] निर्विकल्प होता हुआ [णिव्वाणं] मोक्ष को [लहइ] प्राप्त होता है ।