+ उपसर्ग के समय समता -
जइ हुंति कहवि जइणो उवसग्गा बहुविहा हु दुहजणया ।
ते सहियव्वा णूणं समभावणणाणचित्तेण ॥47॥
यदि भवंति कथमपि यतेरुपसर्गा बहुविधा खलु दुःखजनकाः ।
ते सोढव्या नूनं समभावनाज्ञानचित्तेन ॥४७॥
कर्मोदय वश साधु को, आये यदि अति कष्ट ।
समता धरता ज्ञान से, हो न किन्तु पर इष्ट ॥४७॥
अन्वयार्थ : [जइ] यदि [कहवि] किसी प्रकार [जइणो] मुनि के [दुहजणया] दुःख को उत्पन्न करने वाले [बहुविहा] नाना प्रकार के [उपसग्गा] उपसर्ग [हु] निश्चय से [हुंति] होते हैं तो [समभावणणाणचित्तेण] चित्त में समताभाव को धारण करने वाले मुनि के द्वारा [ते] वे परिषह [णूणं] निश्चय से [सहियव्वा] सहन करने योग्य हैं ।