+ ज्ञानमय भावना से उपसर्ग जीते जाते हैं -
णाणमयभावणाए भवियचित्तेहिं पुरिससीहेहिं ।
सहिया महोवसग्गा अचेयणादीय चउभेया ॥48॥
ज्ञानमयभावनया भावितचित्तैः पुरुषसिंहैः ।
सोढा महोपसर्गा अचेतनादिकाः चतुर्भेदाः ॥४८॥
ज्ञान भावना युक्त नर, सहे महा उपसर्ग ।
उपसर्गों के जानिये, अचेतनादि चतु वर्ग ॥४८॥
अन्वयार्थ : [णाणमयभावणाए] ज्ञान के द्वारा रचित भावना से [भावियचित्तेहिं] वासित चित्त वाले [पुरिससीहेहिं] श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा [अचेयणादीय] अचेतन आदिक [चउभेया] चार प्रकार के [महोवसग्गा] बड़े-बड़े उपसर्ग [सहिया] सहन किये गये हैं ।