+ अचेतन कृत उपसर्ग सहन -
सिवभूइणा विसहिओ महोवसग्गो हु चेयणारहिओ ।
सुकुमालकोसलेहि य तिरियंचकओ महाभीमो ॥49॥
शिवभूतिना विसोढो महोपसर्गः खलु चेतनारहितः ।
सुकुमालकोसलाभ्यां च तिर्यक्कृतो महाभीमः॥४९॥
सहे साधु शिवभूति ने, जड़ कृत सब ही क्लेश ।
कौशल श्री सुकुमाल ने, पशु कृत दुःख अशेष ॥४९॥
अन्वयार्थ : [हु] निश्चय से [सिवभूइणा] शिवभूति मुनि के द्वारा [चेयणारहिओ] अचेतनकृत [महोवसग्गो] महान उपसर्ग [विसहिओ] सहन किया गया है [य] और [सुकुमालकोसलेहि] सुकुमाल तथा सुकौशल मुनियों के द्वारा [तिरियंचकओ] तिर्यंचों के द्वारा किया हुआ [महाभीमो] महान भयंकर महोपसर्ग सहन किया गया है ।