+ मनुष्यकृत उपसर्ग सहन -
गुरुदत्तपंडवेहिं य गयवरकुमरेहिं तह य अवरेहिं ।
माणुसकउ उवसग्गो सहिओ हु महाणुभावेहिं ॥50॥
गुरुदत्तपांडवैः च गजवरकुमारेण तथा चापरैः ।
मनुष्यकृत उपसर्गः सोढो हि महानुभावैः ॥५०॥
पांडव, श्री गुरुदत्त मुनि, गजकुमार सुकुमार ।
सहा इन्होंने मनुजकृत, दुख उपसर्ग अपार ॥५०॥
अन्वयार्थ : [हु] निश्चय से [गुरुदत्तपंडवेहिं] गुरुदत्त तथा पाण्डवों ने [गयवरकुमरेहिं] गजवर कुमार ने [तह य] और [अवरेहिं] अन्य [महाणुभावेहिं] महानुभावों ने [माणुसकउ] मनुष्यकृत [उवसग्गो] उपसर्ग [सहिओ] सहन किया है ।