
अमरकओ उवसग्गो सिरिदत्तसुवण्णभद्दआईहिं ।
समभावणाए सहिओ अप्पाणं झायमाणेहिं ॥51॥
अमरकृत उपसर्गः श्रीदत्तसुवर्णभद्रादिभिः ।
समभावनया सोढ आत्मानं ध्यायद्भिः ॥५१॥
कनकभद्र, श्री दत्त को, हुआ अमर-कृत कष्ट ।
समता से सहते हुए, किया ध्यान सुविशिष्ट ॥५१॥
अन्वयार्थ : [अप्पाणं] आत्मा का [झायमाणेहिं] ध्यान करते हुए [सिरदित्तसुवण्णभद्दआईहिं] श्रीदत्त तथा सुवर्णभद्र आदि मुनियों ने [समभावणाए] समभावना से [अमरकओ] देवकृत, [उवसग्गो] उपसर्ग [सहिओ] सहन किया है ।