
एएहिं अवरेहिं य जहं सहिया थिरमणेहिं उवसग्गा ।
विसहसु तुंपि मुणिवर अप्पसहावे मणं काऊ ॥52॥
एतैरपरैश्च यथा सोढाः स्थिरमनोभिः उपसर्गाः ।
विषहस्व त्वमपि मुनिवर आत्मस्वभावे मनः कृत्वा ॥५२॥
इनने त्यों ही अन्य ने, सहा हृदय-दृढ़ त्रास ।
त्यों मुनिवर ! तुम भी सहो, धर चेतन विश्वास ॥५२॥
अन्वयार्थ : [मुणिवर] हे मुनि श्रेष्ठ ! [थिरमणेहिं] स्थिर चित्त के धारक [एएहिं] इन सुकुमाल आदि ने [य] और [अवरेहिं] अन्य संजयन्त आदि मुनियों ने [जहं] जिस प्रकार [उवसग्गा] उपसर्ग [सहिया] सहन किये हैं [तहं] उसी प्रकार [तुंपि] तुम भी [अप्पसहावे] आत्मस्वभाव में [मणं काऊ] मन लगाकर [विसहसु] सहन करो ।