+ विषय-लोलुपता -
इंदियवाहेहिं हया सरपीडापीडियंगचलचित्ता ।
कत्थवि ण कुणंति रई विसयवणं जंति जणहरिणा ॥53॥
इंद्रियव्याधैर्हताः शरपीडापीडितांगचलचित्ताः ।
कुत्रापि न कुर्वंति रतिं विषयवनं यांति जनहरिणाः ॥५३॥
करण-पारधी से व्यथित, शर-पीड़ा चल चित्त ।
करे प्रेम नहिं नर-हिरण, दौड़ा करे विचित्र ॥५३॥
अन्वयार्थ : [इंदियवाहेहिं] इन्द्रिय रूपी शिकारियों के द्वारा [हया] ताड़ित तथा [सरपीडापीडियंगचलचित्ता] कामरूपी बाण की पीड़ा से पीड़ित शरीर होने के कारण चंचल चित्त [जणहरिणा] मनुष्यरूपी हरिण [कत्थवि] कहीं भी [रई] प्रीति [ण कुणंति] नहीं करते हैं और [विसयवणं] विषयरूपी वन की ओर [जंति] जाते हैं ।