+ मन-स्थित विषयाभिलाषा -
इंदियविसयवियारा जाम2 ण तुट्टंति मणगया खवओ ।
ताव ण सक्कइ काउं परिहारो णिहिलदोसाणं ॥55॥
इंद्रियविषयविकारा यावन्न त्रुटयंति मनोगताः क्षपकः ।
तावन्न शक्नोति कर्तुं परिहारं निखिलदोषाणाम् ॥५५॥
टले न जौं लौ हृदय-गत, इन्द्रिय विषय विकार ।
तब तक कर सकता न मुनि, सकल दोष परिहार ॥५५॥
अन्वयार्थ : [मणगया] मन में स्थित [इंदियविसयवियारा] इन्द्रिय विषय सम्बन्धी विकार [जाम] जब तक [ण तुट्टंति] नहीं टूटते हैं - नष्ट नहीं होते हैं [ताव] तब तक [खवओ] क्षपक [णिहिलदोसाणं] समस्त दोषों का [परिहारो] त्याग [काउं ण सक्कइ] नहीं कर सकता ।