+ इन्द्रिय-सुख में मग्नता -
इंदियमल्लेहिं जिया अमरासुरणरवराण संघाया ।
सरणं विसयाण गया तत्थवि मण्णंति सुक्खाइ ॥56॥
इन्द्रियमल्लैर्जिता अमरासुरनरवराणां संघाताः ।
शरणं विषयाणां गतास्तत्रापि मन्यंते सौख्यानि ॥५६॥
अमर, असुर, नरवर सभी, प्रकट इन्द्रियाधीन ।
विषयों का आधार ले, रहें उसी में लीन ॥५६॥
अन्वयार्थ : [इंदियमल्लेहिं] इन्द्रिय रूपी सुभटों के द्वारा [जिया] पराजित [अमरासुरणरवराण] देव, धरणेन्द्र और श्रेष्ठ मनुष्यों के [संघाया] समूह [विसयाण] विषयों की [सरणं] शरण को [गया] प्राप्त होते हैं तथा [तत्थपि] उन्हीं में [सुक्खाइ] सुख [मण्णंति] मानते हैं ।