+ इन्द्रिय-सुख सुख नहीं -
इंदियगयं ण सुक्खं परदव्वसमागमे हवे जम्हा ।
तम्हा इंदियविरई सुणाणिणो होइ कायव्वा ॥57॥
इंद्रियगतं न सौख्यं परद्रव्यसमागमे भवेद्यस्मात् ।
तस्मादिंद्रियविरतिः सुज्ञानिनो भवति कर्तव्या ॥५७॥
अक्षज सुख, सुख ही नहीं, पर से तद् उत्पत्ति ।
इसीलिए विद्वान् गण, करते अक्ष विरक्ति ॥५७॥
अन्वयार्थ : हे क्षपक ! [इंदियगयं] इन्द्रियों से होने वाला [सुक्खं] सुख [सुक्खं ण] सुख नहीं है [जम्हा] क्योंकि वह [परदव्वसमागमे] पर द्रव्य के संयोग से होता है [तम्हा] इसलिए [सुणाणिणो] सम्यग्ज्ञानी जीव को [इंदियविरई] इन्द्रिय विषयों से विरक्ति [कायव्वा होइ] करने योग्य है ।