+ मन पर नियंत्रण द्वारा इन्द्रिय संयम -
इंदियसेणा पसरइ मणणरवइपेरिया ण संदेहो ।
तम्हा मणसंजमणं खवएण य हवदि कायव्वं ॥58॥
इन्द्रियसेना प्रसरति मनोनरपतिप्रेरिता न संदेहः ।
तस्मान्मनःसंयमनं क्षपकेण च भवति कर्तव्यम् ॥५८॥
पाकर मन-नृप प्रेरणा, करण-सैन्य विस्तार ।
मन संयम इससे करे, मुनिजन बारम्बार ॥५८॥
अन्वयार्थ : [जम्हा] क्योंकि [मणणरवइपेरिया] मन रूपी राजा के द्वारा प्रेरित [इंदियसेना] इन्द्रिय रूपी सेना [पसरइ] फैल रही है [ण संदेहो] इसमें संदेह नहीं है [तम्हा] इसलिए [खवयेण य] क्षपक को [मणसंजमणं] मन का नियन्त्रण [कायव्वं] करने योग्य [हवदि] है ।