
मणणरवइ सुहुभुंजइ अमरासुरखगणरिंदसंजुत्तं ।
णिमिसेणेक्केण जयं तस्सत्थि ण पडिभडो कोइ ॥59॥
मनोनरपतिः संभुक्ते अमरासुरखगनरेंद्रसंयुक्तं ।
निमिषेणैकेन जगत्तस्यास्ति न प्रतिभटः कोऽपि ॥५९॥
मन नरपति है भोगता, क्षण में सुर सुख ठौर ।
इससे जगती में कहीं, मन-सम सुभट न और ॥५९॥
अन्वयार्थ : [मणणरवइ] मन रूपी राजा [अमरासुरखगणरिंदसंजुत्तं] देव, दैत्य, विद्याधर और राजा आदि से सहित [जयं] जगत् को [णिमिसेणेक्केण] एक निमेष मात्र में [सुहुभुंजइ] अपने भोग के योग्य कर लेता है [तस्स] उस मन का [पडिभडो] प्रतिमल्ल [कोई ण अत्थि] कोई भी नहीं है ।