
मणणरवइणो मरणे मरंति सेणाइं इंदियमयाइ ।
ताणं मरणेण पुणो मरंति णिस्सेसकम्माइ ॥60॥
तेसिं मरणे मुक्खो मुक्खे पावेइ सासयं सुक्खं ।
इंदियविसयविमुक्कं तम्हा मणमारणं कुणइ ॥61॥
मनोनरपते र्रणे म्रियंते सैन्यानि इन्द्रियमयानि ।
तेषां मरणेन पुनर्म्रियंते निःशेषकर्माणि ॥६०॥
तेषां मरणे मोक्षो मोक्षे प्राप्नोति शाश्वतं सौख्यम् ।
इन्द्रियविषयविमुक्तं तस्मान्मनोमारणं कुरुत ॥६१॥
मन भूपति के मरण से, मरे अक्ष परिवार ।
उनके मरते ही तुरत, टले कर्म का भार ॥६०॥
कर्म नाश से मोक्ष हो, वहाँ सौख्य हो नित्य ।
इससे मन को मारिये, होकर अक्ष विरक्त ॥६१॥
अन्वयार्थ : [मणणरवइणो] मन रूपी राजा का [मरणे] मरण होने पर [इंदियमयाइ] इन्द्रिय रूप [सेणाइं] सेनाएँ [मरंति] मर जाती हैं [ताणं] उनके [मरणेण]मरण के [पुणो] पश्चात् [णिस्सेसकम्माणि] समस्त कर्म [मरंति] मर जाते हैं - नष्ट हो जाते हैं [तेसिं] कर्मों का [मरणे] मरण होने पर [मुक्खो] मोक्ष होता है और [मुक्खे] मोक्ष में [इंदिय विसयविमुक्कं] इन्द्रियों के विषयों से रहित [सासयं] शाश्वत नित्य [सुक्ख] सुख [पावेइ] प्राप्त होता है [तम्हा] इसलिए [मणमारणं] मन का मरण [कुणइ] करो ।