+ मन-वृक्ष का छेद -
णिल्लूरह मणवच्छो खंडह साहाउ रायदोसा जे ।
अहलो करेह पच्छा मा सिंचह मोहसलिलेण ॥68॥
निर्लूयत मनोवृक्षं खंडयत शाखे रागद्वेषौ यौ ।
अफलं कुरुध्वं पश्चात् मा सिंचत मोहसलिलेन ॥६८॥
काट, तोड़ तू चित्त-तरु, राग-द्वेष दो डाल ।
मोह-सलिल सींचो नहीं, विफल करो इस काल ॥६८॥
अन्वयार्थ : [मणवच्छो] मन रूपी वृक्ष को [णिल्लूरह] छेद डालो [जे राय दोसा साहाउ खंडह] उसकी जो राग-द्वेष रूपी दो शाखाएँ हैं, उन्हें खण्डित कर दो [अहलो करेह] फल रहित कर दो और [मोहसलिलेण] मोह रूपी जल से उसे [पच्छा] फिर [मा सिंचह] मत सींचो ।