
णट्ठे मणवावारे विसएसु ण जंति इंदिया सव्वे ।
छिण्णे तरुस्स मूले कत्तो पुण पल्लवा हुंति ॥69॥
नष्टे मनोव्यापारे विषयेषु न यांति इंद्रियाणि सर्वाणि ।
छिन्नतरो मूर्ले कुतः पुनः पल्लवा भवंति ॥६९॥
विषय न माँगे इन्द्रियें, क्षय हो जाता चित्त ।
नष्ट हुए तरु मूल के, लगे न उसके पत्र ॥६९॥
अन्वयार्थ : [मणवावारे] मन का व्यापार [णट्ठे] नष्ट हो जाने पर [सव्वे इंदिया] समस्त इन्द्रियाँ [विसएसु] विषयों में [ण जंति] नहीं जाती हैं, क्योंकि [तरुस्स] वृक्ष की [मूले] जड़ [छिण्णे] कट जाने पर [पुण] फिर [पल्लवा] पत्ते [कत्तो] कहाँ से [हुंति] हो सकते हैं?